मोबिया-फोबिया की महानता

Posted 11:33 pm by व्‍यंग्‍य-बाण in
मोबाईल की महिमा अब चहूं ओर फैलने लगी है, पहले मोबाईल कुछ खास लोगों के पास दिखता था, अब अंबानी जी के करलो दुनिया मुट्ठी में, के दावे को पूरा करते हुए चायवाले, रिक्शेवाले, ठेला-ठप्पर वाले के हाथों में भी पहुंच चुका है। इसके अलावा हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे को बुलंद करते हुए चायना ने सस्ते मोबाईल की सुविधा भी हमें उपलब्ध करा दी है। देवयुग की कल्पना कलयुग में साकार हो रही है, संसाधन जरूर बदले हैं पर काम वही है, जैसा कि पुरानी धार्मिक फिल्मों में देखने को मिलता है। देवयुग के लोग मानसिक तरंगों के संप्रेषण से एक दूसरे से संवाद कर लेते थे। इस युग में मोबाईल नामक अजूबे ने यह काम कर दिखाया है। महाभारत के युध्द का वर्णन करते हुए जिस तरह संजय, महाराज धृतराष्ट्र को आंखों देखा हाल सुनाते हैं (जिसे आजकल लाईव शो कहा जाता है) कुछ उसी तरह की तरक्की हमारे देश में भी हो चुकी है।
एक सज्जन ऐसे ही सड़क के किनारे खड़े अपने साथी से बतिया रहे थे, हां भाई सुनाओ क्या हालचाल है। हां हां, अरे नई यार, वो क्या है कि मैं अभी बेबीलॉन हॉटल में हूं। बस ऐसे ही, मन हुआ तो सोचा कि यहां का भी मजा ले लूं, बाद में मिलता हूं। उनकी बातों से मैं चौंका, ये क्या भाई आप तो यहां घड़ी चौक पर हो ? उसने जवाब दिया, अरे छोड़ न भाई, ये सब फंडा जरूरी है। अपने बाप का क्या जाता है ऐसा बोलने में। मोबाईल से किसी को पता थोड़े चलेगा कि अपुन किधर है।
लोकल ट्रेन से शाम को घर लौटते वक्त भी ऐसा ही वाक्या हुआ। एक युवक अपने किसी भाई-बंधु से बतिया रहा था, हैलो, हैलो, हां भाई मैं तो मुंबई जा रहा हूं, प्लेन में हूं, क्या करूं जरूरी काम आ गया था। एकाध हफ्ता लग जाएगा, फिर फोन करूंगा, टावर नहीं आ रहा हैलो, हैलो, है....। मैंने उसकी बातों को सुनने के बाद पूछा - भाई आप तो ट्रेन में हो, फिर अपने साथी को प्लेन में होने की बात क्यों कह रहे थे। युवक पहले तो कसमसाया, फिर तुरंत खुद को संभाल लिया - क्या है भाई साहब, यूनिटी में रौब जमाना पड़ता है। अगर कह देता कि लोकल ट्रेन में हूं तो मेरे स्टेटस का क्या होता। इसलिए करना पड़ता है।
एक जानकार मित्र से अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए उसके घर पहुंचा, तो वह भी मोबाईल से कान लगाए हुए कुछ भुनभुना रहा था। मुझे देखकर वह थोड़ा और दूर जाकर कोने में बतियाने लगा। तीन चार मिनट बाद बातचीत खत्म कर वह मेरी तरफ आते हुए बोला, और यार, सुना क्या हाल चाल है, वो थोड़ा सीएम साहब का वर्जन लेने जाना था, बॉस का फोन था, उसी से बात कर रहा था, तू बता क्या बात है।
मैंने कहा - भाई साहब, जिसे देखो वह मोबाईल कान से लगाए भुनभुनाता हुआ मिलता है। फिर सबसे बड़ी बात ये है कि लोग इस पर झूठ बोलने से भी नहीं चूकते। रहेंगे सड़क पर और बताते हैं प्लेन में हैं। ये सब क्या है यार मेरा तो सिर चकराने लगता है।
मित्र ने अपना ज्ञान बघारते हुए कहा- तू भी न यार, बिना मतलब की बातों और लोगों के पीछे पड़ जाता है। भाई जब कलयुग में ये सुविधा हासिल हो गई है कि तुम आराम से बिना किसी पचड़े के झूठ बोल सको, तो इसमें हर्ज क्या है। मोबाईल का सही उपयोग करना तुम्हें आता नहीं।
इसी बीच उसने अपनी अर्धांगिनी को मोबाईल पर ही आर्डर देकर चाय, बिस्किट व पकौड़े मंगा लिए थे।
अपने ज्ञान को मुझे परोसते हुए मित्र कह रहा था - देख भई, कम्यूटरीकृत और मोबिया फोबिया से आधुनिक होते युग को तुझे स्वीकारना पड़ेगा। ये तो वरदान है, तू जब चाहे अपने बॉस से झूठ बोल सकता है, बीवी के बेलन खाने से बच सकता है, कर्जदारों के तगादे से भी राहत पा सकता है, एकाध एक्स्ट्रा घर बसा सकता है, दो चार को अपने पीछे घुमा सकता है, और तो और, अपना स्टेटस भी बढ़ा सकता है।
तभी उसके मोबाईल की घंटी बजी, फोन उठाकर बातचीत करते हुए मित्र ने कहा, ओ हो, सर, दरअसल पेट में बहुत मरोड़ उठ रही है, डाक्टर को दिखाने जा रहा हूं, उसके बाद आफिस आ पाउंगा, माफ कीजिए सर, ओ आउ, आह.....। फिर उसने मोबाईल आफ कर दिया।
मैंने कहा- अरे यार, अभी तो तू मजे से पकौड़ी खा रहा है, चाय की चुस्की ले रहा है। फिर ये सब क्या है ?
मित्र ने तनिक नाराजगी जताते हुए कहा - अरे यार, तू बिलकुल सुधरेगा नहीं, ये सब किए बिना गुजारा होना संभव नहीं।
मैंने अपनी चाय खत्म करते हुए मित्र से विदा ली और बस में बैठ गया घर लौटने के लिए। बस की सामने वाली सीट पर बैठी युवती कान से मोबाईल चिपकाए धीरे धीरे बातें कर रही थी। दो मोबाईल हाथ में, एक कान पर था। आधे घंटे की यात्रा के दौरान उसके तीनों मोबाईल पर तकरीबन दस बार फोन आए। मैं हैरान था कि आखिर यह जमाने को क्या हो गया है। मोबाईल फोबिया के गिरफ्त में आकर हम अपनी संस्कृति, व्यवहार और आचार-संहिता को भी भूलते जा रहे हैं। इसके साथ ही प्रकृति से खिलवाड़ करने से नहीं चूक रहे हैं। मोबाईल तरंगों के चक्कर में आसपास घूमते, कलरव करते पक्षी हमसे दूर होते जा रहे हैं, क्योंकि अब तो मोबाईल की रिंगटोन भी कोयल की तरह कूकती है तो हमें उसकी क्या जरूरत ? जय हो मोबाईल देवता की, मोबिया-फोबिया ने जब धीरे धीरे देशभर में अपना महानता का प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है तो मैं उसकी जद में आने से कैसे बच सकता हूं ?



8 comment(s) to... “मोबिया-फोबिया की महानता”

8 टिप्पणियाँ:

राजेन्द्र राठौर ने कहा…

बहुत ही अच्छा आलेख है, आज के इस युग में मोबाइल ने अपनी गहरी पैठ जमा ली है. आज ऐसी स्थिति हो गयी है कि लोग दिखावे के लिए ४-४ मोबाइल रखने लगे हैं.



Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

आप की बातों से सहमत हूँ...
सार्थक लेखन के लिए हार्दिक बधाई....



Dr Varsha Singh ने कहा…

मोबाईल की महिमा पर बहुत दिलचस्प लेख....

रंगपंचमी की आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ...



Swarajya karun ने कहा…

मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद . दिलचस्प है आपकी मोबाईल-महिमा . आभार.



डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

संचार-क्रांति से लाभ के साथ कुछ हानियाँ भी हैं।
मोबाइल पर आपका यह आलेख असंगतियों की ओर
संकेत करता है। भोड़ेपन और दोगलेपन की खिल्ली
उड़ाता है। इसलिए इसकी गणना उपहास की श्रेणी में
की जा सकती है। व्यंग्य-वाण में आगे और पैनापन
बढ़ेगा। इस कामना के साथ...
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प्रवाहित रहे यह सतत भाव-धारा।
जिसे आपने इंटरनेट पर उतारा॥
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी



डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सच में मोबाईल ने सवाद बढाया है पर कभी कभी लगत है बेवजह का संवाद ...... संचार क्रांति हमारे जीवन के हर हिस्से में पैठ बना चुकी है... विचारणीय आलेख



डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

*लगता



Patali-The-Village ने कहा…

संचार क्रांति हमारे जीवन के हर हिस्से में पैठ बना चुकी है|
सार्थक लेखन के लिए हार्दिक बधाई|



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