शाकाहारी बकरा !

Posted 10:14 pm by व्‍यंग्‍य-बाण in
बकरा यानि बलि का बकरा होना सिर्फ अकेले उनका भाग्य ही नहीं रहा है। बकरे जैसा भाग्य तो मानव के हिस्से में भी रहा है, तभी तो शादी के पहले दूल्हे के दोस्त-यार उसकी टांग खींचने से नहीं चूकते, ’’अब तो बलि का बकरा बनने जा रहा मेरा मुन्नू। बेटा, इसके बाद तो किसी काम का नहीं रहेगा’’।
ऐसा लगता है मानो घर में बहू नहीं कोई कसाई आ रही हो, जो आते साथ ही अपने नैनों की तेज धार से दूल्हे की बलि चढ़ा देगी। सड़क पर बकरों के झुंड को बिलबिलाते देखकर तरस आने लगता है इन्हें देखकर कि आखिर इनके सिर तो एक दिन कटने ही हैं। दुनिया, देश, प्रदेश, समाज में चारों तरफ मुझे बेचारे बकरे ही बकरे दिखते हैं। रोज कटने को तैयार, जैसे ही कोई खरीदार इन्हें बाजार से खरीदता है, बकरे की मौत का काउंटडाउन शुरू हो जाता है। पर मैं खुद को भी इन बकरों से परे नहीं समझता हूं, क्योंकि सात फेरे मैंने ले ही लिए, तो खुद को इस कौम से अलग रखना मेरे बस की बात नहीं। घर से लेकर देश दुनिया में फैले भ्रष्टाचारी कसाई की तरह वैसे भी रोज जनता को बकरा समझ कर उनके हितों की, अधिकारों की, हक की बलि चढ़ा ही रहे हैं।
इसी तरह मेरी इकलौती अर्धागिंनी (अर्धांगिनी को इकलौती कहोगे, तो सुखी रहोगे) और तीन सुपात्र बच्चे रोजाना मेरी जेब की बलि चढ़ाने में भिड़े रहते हैं, जेब न हुई कोई बकरी-बकरा हो गई। पिछले कई दिनों ये सभी मेरी जेब में आने वाली एक माह की तनख्वाह की बलि चढ़ाने के लिए अपनी आस्तीनें ताने बैठे थे कि ड्रीम पाइंट होटल लेकर चलो। रोज रोज की किचकिच से तंग आकर मैंने सोच लिया कि इससे छुटकारा पाने के लिए यह बलि दे दी जाए। लिहाजा उस शाम सभी को लेकर मैं पहुंच गया होटल। बेयरे ने थोड़ी देर तक दूर से ही मुझे घूर निहारकर देखा, फिर आया ’’ हां साब, आर्डर बोलिए। मैंने कहा ‘‘मेनू कार्ड तो दिखाओ। कार्ड देकर वह चला गया। कुछ देर तक मैं मेनू की लिस्ट देखता रहा। कुछ समझ में आ रहा था और कुछ समझने की मैं कोशिश कर रहा था, लेकिन एक व्यंजन मेरी समझ से बिलकुल परे था। मेनू कार्ड में एक जगह लिखा हुआ था ‘‘शाकाहारी बकरा’’। मैं चौंका, ये कौन सा नया व्यंजन पैदा हो गया। इतने में बेयरा फिर आ गया मैंने उसे बच्चों की पसंद का आर्डर देकर चलता किया। मैं ठहरा शाकाहारी जीव, नानवेज में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन बकरे का व्यंजन वह भी शाकाहारी, मुझे बार बार सोचने पर मजबूर कर रहा था। आखिर मैंने काउंटर पर मौजूद मैनेजर को बुला कर पूछ ही लिया। उसने कहा ‘‘अरे साब, बकरा तो शाकाहारी होता है। मैंने कहा ’’ वो तो सभी बकरे शाकाहारी होते हैं, इसमें नया क्या है। मैनेजर बोला ’’क्या है कि आजकल डिशेज का नया नया नाम रखने का फैशन है, इसलिए इसका नाम रख दिया है। मैंने माथा धर लिया, अरे भाई, शाकाहारी होना तो बेचारे बकरे की किस्मत में होता ही है, पर उसे चट करने वाले तो मांसाहारी हुए न। मैनेजर ने नाक भौं सिकोड़ते हुए वहां से खिसकने में ही भलाई समझी। फिलहाल मैंने और बच्चों ने शाकाहारी व्यंजनों का लुत्फ उठाया, अपनी तनख्वाह की बलि चढ़ाकर लौटते हुए मैं सोच रहा था कि देश का बहुत बड़ा तबका भी होटल के उसी शाकाहारी बकरे की तरह निरीह है, जिनके हक हिसाब को व्यंजन की तरह मजे ले लेकर भ्रष्ट, बेईमान लोग खाते ही नहीं, बल्कि निगल जाते हैं। लेकिन बकरा तो बेचारा ही ठहरा, ऐसे कसाईयों से निपटने के लिए उसे उपरवाले को अपनी किस्मत बदलवाने का आवेदन देना पड़ेगा। आवेदन पर कोई सुनवाई हुई तो बल्ले बल्ले, वरना उसका सिर तो कटने के लिए तैयार बैठा है।



4 comment(s) to... “शाकाहारी बकरा !”

4 टिप्पणियाँ:

aarkay ने कहा…

.......ji haan aisa bakra ji jibah hone ke liye har dam tayyar milega !



एम सिंह ने कहा…

हा हा. अच्छा व्यंग्य है.



एम सिंह ने कहा…

मेरा ब्लॉग भी देखें
हिन्दुस्तान अब हिन्दुस्तान नहीं, पुराना भास्कर हो गया दुनाली



Rajeev Panchhi ने कहा…

Well.... very interesting 'vyang". Congrats.



एक टिप्पणी भेजें